Thursday, July 16, 2015

आईपीएस हो तो सरकार का काम करो...



आईपीएस हो तो सरकार का काम करो...
ठाकुर दम्पति को लग रहा था कि मुलायम सिंह अमूल चीज का टुकड़ा हैं जिसे वो मजे से खा जायेंगे| भईये जिस नेता जी ने ममता बहन को लखनऊ बुलाकर प्रेस कांफ्रेंस में साथ में खड़े होकर बेरंग कोलकाता भिजवा दिया, वो नेताजी अमूल चीज का टुकड़ा नहीं, कडक सुपारी हैं, दांत तोड़ने के बाद ही टूटती है ये सुपारी| आप किस खेत की मूली हैं? आईपीएस याने वो प्रजाति , जिसे अंग्रेज अपनी जगह राज करने के लिए छोड़ गए| अपने चक्कर सोफिस्टीकेटेड टाईप के नेताओं पर चलाना| नेता जी ने सीपीएम जैसी पार्टी और प्रकाश करात जैसे होशियार आदमी को चारों खाने चित्त करके मनमोहन सिंह की सरकार को डेढ़ साल की आक्सीजन दे दी थी| आपका रिकार्ड तो वैसे भी खराब है| आईपीएस हो तो सरकार का काम करो| ये क्या पब्लिक फंड से तनख्वाह लोगे और रोज रोज हाई कोर्ट/ सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल लगाते रहोगे| याने खाओगे श्यामनाथ की और बजाओगे राजनाथ की, नेता जी के सामने ये चलने वाला नहीं ठाकुर| बचवा, व्हिस्लब्लोवर, बागी या लोकप्रिय बनने की इतनी ही चाहत है तो मारो सरकारी नौकरी को लात और बन जाओ केजरीवाल| या फिर यह कहो कि तुम्हारा टांका भाजपा के साथ भिड़ गया है और अब तुम भाजपा के 'आजअनाथ' के इशारे पर उछल कूद कर रहे हो|

मोदी जी हमारे प्रधानमंत्री हैं, उनकी बात को समझो! आई टी का ज़माना है| कुछ छिप नहीं सकता| उन्होंने इसी आईटी की बदौलत कांग्रेस की सारी पोल पट्टी मीडिया के जरिये पूरे देश की पब्लिक के सामने लाई थी, और पब्लिक हर गली, चौराहे में गाती घूमती थी "ये पब्लिक है ये सब जानती है, ये पब्लिक है' और मोदी जी चुनाव जीत गए थे| बोले तो, आपके बारे में भी सब लीक हो गया है| आपका पूरा परिवार पेशेवर पीआईऐली है| सुना है आपकी पत्नी ने पिछले तीन-चार साल में डेढ़ सौ पीआईएल लगाई हैं| यहाँ तक की कोर्ट भी परेशान है, आप लोगों से| कोर्ट ने आपकी पत्नी को हर पीआईएल पर 25 हजार रुपये जमा करने का आदेश दिया है| और कहा है कि ये पैसे तभी वापस किए जाएंगे जब पीआईएल सही पाई जाएगी। अब हम यह तो न पूछेंगे कि हर पीआईएल के लिए पच्चीस हजार रुपये कहाँ से आयेंगे| इसलिए नहीं पूछेंगे क्योंकि हमने वह गाना अच्छे से सुना है कि 'उपर वाला जब भी देता, देता छप्पर फाड़ के'| हमने तो यह भी सूना है ठाकुर साहब कि इसी साल लखनऊ कोर्ट की बेंच ने आपकी पत्नी नूतन ठाकुर पर ओछी पीआईएल दाखिल करने के लिए एक लाख का जुर्माना लगाया था।

बहरहाल, हमारी आदत किसी और के टंटे में अपनी टंगड़ी डालने की बिलकुल नहीं है| वह तो आपने कहा कि आप यह सब इसलिए करते हैं क्योंकि आपको इंसाफ के साथ लगाव है और आप किसी की मदद करते हो तो आपको बढ़िया लगता है और आख़िरी और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कि आप यह सब अपनी पहचान बनाने के लिए करते हैं| यह तो आप अपनी आईपीएसगिरी करते हुए भी कर सकते थे और एक नेकदिल, इन्साफ पसंद, दूसरों का मददगार अधिकारी के रूप में नाम कमा सकते थे| इसके लिए आप सिंघम के दोनों पार्ट भी देख सकते थे| ये आईपीएसगिरी छोड़कर एफआईआर और पीआईएल वगैरह के चक्कर में पड़ने की क्या जरुरत थी और वह भी हमारे टेक्स के पैसों से मिलने वाली तनख्वाह के बल पर| पर, क्या किया जाए, ये पहचान बनाने का शौक मुआ जुएँ-दारु से ज्यादा लती होता है|

हमारे एक गुरु थे| उनकी फौत हो गयी| उन्हें जन्नत नसीब हो! तो, जो छात्र कक्षा में आगे आगे उत्तर देने की कोशिश करता था और उसके उत्तर अकसर गलत होते थे, उससे गुरूजी कहा करते थे कि अपनी पहचान बनाने का सबसे आसान तरीका है सारे कपड़े उतारकर बीच बाजार में नंगे दौड़ जाओ| पर, आप ऐसा नहीं करना| हम आपको कारण भी बता देते हैं, हमारे शहर में भी एक ठाकुर साहब थे, अब पता नहीं कहाँ हैं? वो आईएएस की तैय्यारी कर रहे थे| उन्हें अपनी पहचान बनाने की बड़ी जल्दी थी, बस एक दिन रात को सारे कपड़े उतारकर ठाकुर साहब स्कूटर पर सैर के लिए निकल पड़े| फिर, आप ही की बिरादरी के किसी अधिकारी के चंगुल में फंसे| धुम्मस हुई, दूसरे दिन अखबार में नाम आया और पहचान बन गयी| तो, वैसे तो बिना माँगी सलाह की कोई वकत नहीं होती, पर हम भी अपनी आदत से मजबूर हैं, दिए देते हैं कि आप ऐसा कतई नहीं करना| आप तो हमारे टेक्स के पैसों को खानदानी संपत्ति मानकर सरकारी खजाने से तनख्वाह लेते हुए पूरे परिवार सहित पीएलआई में लगे रहो| हां, ये व्यवसाय और अच्छे से चले और ये मुलायम रूपी विघ्न बाधाएं व्यवसाय में रुकावट न डालें, इसके लिए निर्मल बाबा से सलाह ले लें| बच्चे विरोध करेंगे, पर आप ध्यान न देना| हो सकता है बाबा आपको कोई अच्छा सा टोटका बता दे..|
अरुण कान्त शुक्ला
16 जुलाई,2015  

Monday, May 18, 2015

पहले नाक के नीचे तो झाँक लीजिये..!



पहले नाक के नीचे तो झाँक लीजिये..!

ऐसा कहा जाता है की जिसकी नाक लम्बी होती है, उसे उसकी नाक के नीचे क्या हो रहा है पता नहीं चलता| केंद्र सरकार में गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ भी लगता है कुछ ऐसा ही हो रहा है| आज जब वे लोकसभा में खड़े होकर लोकसभा के सदस्यों को यह कहकर लुभा रहे थे कि भारत सरकार को अच्छे से पता है कि 1993 बम धमाकों समेत कई मामलों में वॉन्टेड दाऊद पाकिस्तान में ही है और उसे हर हाल मे भारत लाया जाएगा, तब उन्हें यह नहीं पता था कि उनकी नाक के नीचे ही दिल्ली में, जहां की क़ानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उनके और उनके मंत्रालय की ही है, एक ट्रेफिक हवलदार न केवल एक महिला से चालान के नाम पर रिश्वत मांग रहा था बल्कि चालान की रसीद माँगने पर उसने महिला और उसके बच्चों को स्कूटी में लात मारकर गिरा भी दिया, जिससे स्कूटी की लाईट टूट गयी| अपनी दो बच्चियों के सामने हुए इस अभद्र व्यवहार और नुकसान से अपमानित महिला ने गुस्से में उस हवलदार की मोटरसाईकिल का कांच पत्थर मारकर तोड़ दिया तो हवलदार ने एक बड़ी ईंट उठाकर महिला के सर को निशाना बनाकर मारी, वह तो गनीमत थी कि महिला मुड़ गयी और ईंट सर में लगने के बजाय उसकी रीढ़ में लगी| इनका एक कारनामा अभी केजरीवाल झेल रहे हैं, क़ानून व्यवस्था राजनाथसिंह के विभाग का काम है और डीटीसी के ड्राईवर को बचाने का काम इनकी पुलिस को करना चाहिए था| वह तो हुआ नहीं और अब डीटीसी के ड्राईवर हड़ताल करके एक करोड़ का मुआवजा केजरी सरकार से मांग रहे हैं| भाजपा के दिल्ली के अध्यक्ष प्रेस कांफ्रेंस करके बता रहे हैं कि उनकी हड़ताल में भाजपा का कोई हाथ नहीं है| नहीं होगा! पर क़ानून व्यवस्था के ढुलमुल होने में तो भाजपा की केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय और गृहमंत्री की ही जिम्मेदारी है, यह तो मान लीजिये| पर, फिर वही दिक्कत मानें कैसे? दिखा जो नहीं! दिखा क्यों नहीं? दिखा इसलिए नहीं कि नाक जरुरत से कुछ ज्यादा ही लंबी है और जिसकी नाक लंबी होती है , उसे उसके नीचे क्या हो रहा है दिखता नहीं! तो गृहमंत्री जी हम पिछले 22 सालों से दाऊद के कभी पाकिस्तान, कभी दुबई में होने की खबरें, वालीवुड से उसके नातों और उसे हर हाल में लेकर आयेंगे की कसमों को सुन रहे हैं| इन बाईस सालों में सात साल आपकी भी पार्टी सत्ता में रही है और क्या क्या हुआ, आप जानते हैं! अब यदि आप दाऊद को लायेंगे, ये लोकसभा के अन्दर बैठे लोगों को लुभाने के लिए कह रहे थे, तो कोई बात नहीं और यदि हमें भरमाने के लिए कह रहे हैं तो हमारी आपसे विनम्र विनती है कि पहले नाक के नीचे तो झाँक लीजिये..!

अच्छा हुआ, अरुणा शानबाग, तुम मर गईं...



अच्छा हुआ, अरुणा शानबाग, तुम मर गईं...

अच्छा हुआ अरुणा शानबाग तुम मर गईं! तुम 42 साल तक कोमा में रहीं| शरीर के हिसाब से यह एक दर्दनाक स्थिति है| जंजीरों से बांधकर किये गए क्रूर बलात्कार के बाद 42 साल तक ज़िंदा मृत के सामान पड़े रहना, यह वह जिन्दगी है जो बुद्ध, विवेकानंद, गांधी के देश के लोगों ने तुन्हें दी| मैं ईश्वर जैसी किसी सत्ता को नहीं मानता| पर, ईश्वर नाम की उस शख्सियत से डरता बहुत हूँ| क्यों डरता हूँ, क्योंकि इस देश में उसी के नाम से शासन चलाया जाता है| क्यों डरता हूँ, क्योंकि हर बलात्कार के बाद यही कहा जाता है कि ईश्वर की यही मर्जी थी| क्यों डरता हूँ, क्योंकि उसकी और उसके अनुयायियों की अनुकंपनाएं सीधे-सच्चे-सहृदय लोगों पर नहीं बरसतीं| सीधे-सच्चे-सहृदय लोगों के लिए उसके पास सिर्फ सजाएं हैं, क्रूरता है| किसी दिन मिला तो उससे पूछूंगा कि सीधे-सच्चे-सहृदय लोगों को ही उसकी सजाएं क्यों रोज भुगतनी पड़ती हैं?ये सजायें, जो रोजमर्रा के अमानवीय अपमानों से शुरू होती हैं और भूख के बाजार से होता हुई जिस्म की मौत पर खत्म होती हैं|

मुझे नहीं मालूम, अभी तक विज्ञान इसका पता कर पाया है कि नहीं कि जो व्यक्ति कोमा में रहता है वह सोच सकता है या नहीं? वह सुन सकता है या नहीं? पर, मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ, शायद सुन सकता होगा! पर सोच तो कतई नहीं सकता होगा| मेरे इस विशवास का कारण है| मेरा यह देश पिछले 68 वर्ष से, 15 अगस्त, 1947 से कोमा में है| तुम 42 साल लगातार कोमा में रहीं, तुम्हारे साथ बलात्कार हुआ था| तुमने प्रतिवाद भी किया होगा| तुम्हें चोट लगी थी| तुम सहन नहीं कर पाईं| देशवासी किसी भी देश का शरीर होते हैं| इस देश के लोगों के साथ भी 200 वर्षों तक बलात्कार हुआ| हमने संघर्ष भी किया| हमारे पुरुखों ने अपनी जानें कुर्बान कीं| घायल हुए| पर, कोमा में नहीं गए| आजादी हासिल किये| पर, उसके बाद हमारे हुक्मरानों ने हमें कोमा में भेज दिया| तुम घायल होकर कोमा में गईं| हम होश-ओ-हवास में कोमा में भेजे गए| लोकतंत्र के कोमा में| हमारे अपने स्वराज के कोमा में| हमें हर पांच साल में चुनावी ग्लूकोज की बाटल चढ़ाई जाती है| उस बाटल में आश्वासन का इंजेक्शन लगाया जाता है| मोहक सपनों के वेंटीलेटर पर हमें ज़िंदा रखा जाता है| हम एक ऐसे कोमा में हैं जिसमें देख सकते हैं पर कुछ कर नहीं सकते| सुन सकते हैं पर सोच नहीं सकते| हमें मूर्ख बनाया जा रहा है, जान सकते हैं पर समझ नहीं सकते| मोहक सपनों का वेंटीलेटर हमें ज़िंदा रहने के भ्रम का अहसास कराता है| हम स्वयं को सुरक्षित समझते हैं, पर हैं नहीं| तुम भी इसी कोमा में थीं| तुम्हें लगता था, इतना बड़ा अस्पताल, सहकर्मी, तुम सुरक्षित हो, पर तुम दूसरे कोमा में चली गईं|

इस दूसरे कोमा में जाने वाली तुम अकेली नहीं हो| निर्भया भी गयी है| प्रति मिनिट एक लड़की जाती है| हर घंटे एक किसान जाता है| हर घंटे एक मजदूर जाता है| और सभी मर जाते हैं| जो मरते नहीं हैं, वे मोहक सपनों और आश्वासनों के कोमा में मृतप्राय पड़े रहते हैं| इसीलिये उन्हें तुम्हारे मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता| इसलिए कि जो कोमा में हैं, उन्हें किसी भी चीज से कोई फर्क नहीं पड़ता|

अरुण कांत शुक्ला,                                                       
18/5/2015